Dwandwa
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मुकेश का सगा भाई जिंदा है क्या ? अगर है तो कहाँ है? उसे ढूँढना चाहिए । अपने जीवन की गाथा उसे सुनानी है । इस विशाल संसार में सिर्फ वे ही दोनों एक-दूसरे से रक्त से जुड़े हैं ।जीवन की घटनाएँ विचित्र रूप ले रही थीं । तीन दिन पहले वह रूपिंदर-सुरिंदर का पंजाबी मुंडा था । बीस दिन पहले वह त्रिवेदीजी -सुमन का इकलौता बेटा था । लक्ष्मीपुत्र था । भारतीय था । आज वह भारत का भी नहीं है । इस भूमि का; इस देश का; इस संस्कृति का नहीं है । अब वह अमेरिकी है!- द्वंद्व’ से” मुझे आपसे कुछ पूछना है । अच्छा; पहले यह बताइए कि शंकर मेरा कुछ नहीं लगता; फिर हम दोनों हमशक्ल कैसे हैं ?” माँजी; एक सवाल पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगी? शंकर के पिता का देहांत हुआ कैसे? उनके मरण में बहुत राज छिपे हैं । जहाँ तक मेरी समझ है; मेरे पिताजी का कोई रिश्तेदार इस इलाके में नहीं रहा । न पहले थे; न अब हैं । हम लोग शुरू से ही दिल्ली में रहे ।..’ तर्पण ‘ सेसुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के ये दोनों पठनीय सामाजिक उपन्यास पाठकों की संवेदनशीलता और मर्म को भीतर तक छू जाएँगे ।
मुकेश का सगा भाई जिंदा है क्या ? अगर है तो कहाँ है? उसे ढूँढना चाहिए । अपने जीवन की गाथा उसे सुनानी है । इस विशाल संसार में सिर्फ वे ही दोनों एक-दूसरे से रक्त से जुड़े हैं ।जीवन की घटनाएँ विचित्र रूप ले रही थीं । तीन दिन पहले वह रूपिंदर-सुरिंदर का पंजाबी मुंडा था । बीस दिन पहले वह त्रिवेदीजी -सुमन का इकलौता बेटा था । लक्ष्मीपुत्र था । भारतीय था । आज वह भारत का भी नहीं है । इस भूमि का; इस देश का; इस संस्कृति का नहीं है । अब वह अमेरिकी है!- द्वंद्व’ से” मुझे आपसे कुछ पूछना है । अच्छा; पहले यह बताइए कि शंकर मेरा कुछ नहीं लगता; फिर हम दोनों हमशक्ल कैसे हैं ?” माँजी; एक सवाल पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगी? शंकर के पिता का देहांत हुआ कैसे? उनके मरण में बहुत राज छिपे हैं । जहाँ तक मेरी समझ है; मेरे पिताजी का कोई रिश्तेदार इस इलाके में नहीं रहा । न पहले थे; न अब हैं । हम लोग शुरू से ही दिल्ली में रहे ।..’ तर्पण ‘ सेसुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के ये दोनों पठनीय सामाजिक उपन्यास पाठकों की संवेदनशीलता और मर्म को भीतर तक छू जाएँगे ।
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