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Jaishankar Prasad Ki Sarva-Shrestha Kahaniyaan - Indrajaal; Chhota Jadugar; Paap Ki Parajay & Other Stories

Publisher:
Sanage Publishing House LLP
| Author:
Jaishankar Prasad
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
Publisher:
Sanage Publishing House LLP
Author:
Jaishankar Prasad
Language:
Hindi
Format:
Paperback

Original price was: ₹125.Current price is: ₹124.

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7-10 Days

Out of stock

ISBN:
Category:
Page Extent:
200

इस पुस्तक में 28 कहानियाँ संकलित हैं। आकाशदीप, प्रतिध्वनि, अपराधी, बनंजारा और चूड़ीवाली को आंतरिक पुनर्जागरण का संपुष्ट कहना अतिशयोक्त नहीं होगी। ग्राम, रसिया बालम, शरणागत, सिकंदर की शपथ, अशोक, जहाँनारा, मदन—मृणालिनी भी इसी श्रेणी की कहानियाँ हैं। इंद्रजाल, में ‘मन का मन से वार्तालाप’ बहुत सुंदर है। छोटा जादूगर, में दायित्व बोध का संदेश है। नूरी, गुंडा, अनबोला, विराम चिन्ह जैसी रचनाओं में भीतरी व वाह्य का द्वंद का अंतर सम्मिश्रण है। इस तरह वह इतिहास व यथार्थ के सम्मिश्रण की कहानियों से आगे बढ़े हैं। उनकी लगभग सभी कहानियों में व्यक्ति की छटपटाहट है, जो कभी समाज की कुरीतियों से लड़ती है तो कभी स्वयं से। यही मार्मिकता उन्हें जनसाधारण का लेखक निरूपित करता है। प्रसाद जी के द्वारा लिखी गई विभिन्न विधाओं में जो भी रचनाएँ हैं वह इनकी गहन अध्ययन शीलता का परिणाम है। प्रसाद की कहानियों में चित्रात्मकता, नाटकीयता, आंतरिक संघर्ष, भीतरी और बाहरी दोनों को अभिव्यक्त करने की पूरी क्षमता है। इतना ही नहीं प्रसाद जी की कहानियों में जहाँ एक ओर भावनाओं की तीव्रता और मनोवेगों का चित्रण है, वहीं दूसरी ओर वह कहानी को बांधकर रखते हैं। ये कहानियाँ हमें उनके व्यक्तित्व को समझने में न केवल सहायक होंगी, बल्कि उनके और नज़दीक ले जाएँगी।

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Description

इस पुस्तक में 28 कहानियाँ संकलित हैं। आकाशदीप, प्रतिध्वनि, अपराधी, बनंजारा और चूड़ीवाली को आंतरिक पुनर्जागरण का संपुष्ट कहना अतिशयोक्त नहीं होगी। ग्राम, रसिया बालम, शरणागत, सिकंदर की शपथ, अशोक, जहाँनारा, मदन—मृणालिनी भी इसी श्रेणी की कहानियाँ हैं। इंद्रजाल, में ‘मन का मन से वार्तालाप’ बहुत सुंदर है। छोटा जादूगर, में दायित्व बोध का संदेश है। नूरी, गुंडा, अनबोला, विराम चिन्ह जैसी रचनाओं में भीतरी व वाह्य का द्वंद का अंतर सम्मिश्रण है। इस तरह वह इतिहास व यथार्थ के सम्मिश्रण की कहानियों से आगे बढ़े हैं। उनकी लगभग सभी कहानियों में व्यक्ति की छटपटाहट है, जो कभी समाज की कुरीतियों से लड़ती है तो कभी स्वयं से। यही मार्मिकता उन्हें जनसाधारण का लेखक निरूपित करता है। प्रसाद जी के द्वारा लिखी गई विभिन्न विधाओं में जो भी रचनाएँ हैं वह इनकी गहन अध्ययन शीलता का परिणाम है। प्रसाद की कहानियों में चित्रात्मकता, नाटकीयता, आंतरिक संघर्ष, भीतरी और बाहरी दोनों को अभिव्यक्त करने की पूरी क्षमता है। इतना ही नहीं प्रसाद जी की कहानियों में जहाँ एक ओर भावनाओं की तीव्रता और मनोवेगों का चित्रण है, वहीं दूसरी ओर वह कहानी को बांधकर रखते हैं। ये कहानियाँ हमें उनके व्यक्तित्व को समझने में न केवल सहायक होंगी, बल्कि उनके और नज़दीक ले जाएँगी।

About Author

जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी, 1889 - 14 जनवरी, 1937); जयशंकर प्रसाद; हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। वह कहानी और उपन्यास लेखन में नाटक लेखन से ज़्यादा आधुनिक थे। कहानी को आधुनिक जगत की विधा बनाने में उनका योगदान अद्वितीय है। यह उन्हीं का कला—कौशल है कि उन्होंने आम व्यक्ति के जीवन की घटनाओं के वाह्य और आंतरिक विचलन को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया। कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास सभी विधाओं में लिखने वाले जयशंकर प्रसाद की प्रारम्भिक कृतियां, खासतौर पर नाटकों में प्राच्य भाषा संस्कृत और ठेठ देसज शब्दों का प्रभाव दिखता है। स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी जैसे लोकप्रिय नाटकों में यह स्पष्ट नजर आता है। वहीं, उपन्यास कंकाल में हिन्दू धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की सच्चाई को उजागर किया है, तो तितली सामाजिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया उनका दूसरा उपन्यास है, इसमें नारी की छवि एक आदर्श प्रेमिका और आदर्श पत्नी की है। उनकी कहानियों और नाटक के विषय सामाजिक, ऐतिहासिक और पौराणिक हैं। निश्चित ही इन सभी कृतियों में एक दार्शनिक झुकाव दिखाई देता है। इसका एक कारण उनके स्वयं के परिवेश से रहा होगा, जब बचपन में उनके पिता के गुज़र जाने के बाद परिवार आर्थिक तंगी से जूझते हुए कठिनाइयों का सामना कर रहा था। इसी परिस्थिति में उन्होंने स्वयं को बड़ा होता हुआ पाया। इसके चलते पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, बावज़ूद इसके स्वाध्याय जारी रखा और साहित्य, भाषा, इतिहास में उत्कृष्ट ज्ञान अर्जित किया। वह कहानियों के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर चोट करने से भी नहीं चूकते। खड़ी भाषा का प्रयोग, और आधुनिक पीढ़ी में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। प्रसाद ने एक लौ प्रज्जवलित कर दी थी, जिसका बाद के लेखकों ने अनुसरण किया। मात्र 48 वर्ष के अल्प जीवनकाल में उन्होंने हिन्दी साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनकी अनेकों रचनाएँ आज कालजयी हैं।

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