AN ENCHANTMENT OF RAVENS
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Adriatic: A CONCERT OF CIVILIZATIONS AT THE END OF THE MODERN AGE
Adriatic: A CONCERT OF CIVILIZATIONS AT THE END OF THE MODERN AGE Original price was: ₹2,150.Current price is: ₹1,612.

BHARAT MATA KE VEER PUTRA BIRSA MUNDA (HINDI)

Publisher:
MANJUL
| Author:
TUHIN A. SINHA & ANKITA VERMA
| Language:
English
| Format:
Paperback
Publisher:
MANJUL
Author:
TUHIN A. SINHA & ANKITA VERMA
Language:
English
Format:
Paperback

Original price was: ₹399.Current price is: ₹319.

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ISBN:
Category:
Page Extent:
284

19वीं शताब्दी में भारत के उस मध्य भाग में आदिवासी अत्यंत बदहाली और अंधकार का जीवन जी रहे थे, जो अब झारखंड राज्य कहलाता है। औपनिवेशिक सत्ता ने स्थानीय षड्यंत्रकारियों की मदद से उनके चारों ओर अत्याचार और शोषण का जाल बुन दिया था, जो किसी जल्लाद के फंदे की तरह कसता जा रहा था। जो कुछ उनके दिल के क़रीब था, यानी उनकी भूमि, घर, इतिहास, परंपराएं, धर्म और परिवार, वो महारानी के लिए भव्य, लेकिन बेरहम साम्राज्य बनाने की व्यापक औपनिवेशिक योजना का शिकार हो गया था। लोगों को हालाँकि जब धूल में मिलाया जाता है और उनकी पहचान पूरी तरह ख़त्म होने का ख़तरा पैदा हो जाता है, तो वे गर्जना के साथ तपिश भरी, क्रोधित आग की तरह इतने भड़क उठते हैं कि यह साम्राज्य के दिल में भीतर तक गूँजने लगता है और सत्ता में बैठे लोगों में भय से सिहरन दौड़ जाती है। यह एक ऐसी आग होती है जो विद्रोह को जन्म देती है। ऐसे ही एक विद्रोह के केंद्र में थे पच्चीस साल के युवा बिरसा मुंडा। उन्होंने अपने समुदाय और उसके लोगों की ज़िंदगियों की रक्षा के लिए आदिवासियों की लड़ाई का नेतृत्व करने का फ़ैसला किया। शेर दिल योद्धा, कल्याणकर्ता, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और एक भुला दिया गया नायक। सच्ची घटनाओं पर आधारित, साहस की यह वीर गाथा बिरसा मुंडा के जीवन को एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने अत्यंत संक्षिप्त जीवन में आदिवासी समुदाय को संगठित किया और ज़बरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। उन्होंने भेदभाव रहित और अधिक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना की और इसके लिए लड़ते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। यह किताब एक आदिवासी नायक की रोमांचकारी कहानी है जिसका इतिहास की ज़्यादातर किताबें उल्लेख नहीं करतीं। स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

Reviews

  1. Vineet Kumar Singh

    यह सोचकर आश्चर्य होता है कि बिरसा मुंडा केवल 25 वर्ष जीवित रहे . इतने कम उम्र में उन्होंने संगठन बनाया, अंग्रेजों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, मिशनरीओं द्वारा धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई, धर्मान्तरित लोगों को वापस अपने धर्म से जोड़ा, अपने लोगों के बीच एक चिकित्सक, एक उपदेशक का काम किया. लोग सोचेंगे कि ऐसा तो बहुत लोगों ने किया है. लेकिन यहाँ बात ये है कि जो बिरसा मुंडा कि पृष्ठभूमि है और झारखण्ड कि जो भौगोलिक स्थिति है, वहां यह काम मुश्किल था. इसलिए बिसरा मुंडा विशेष हैं.
    बिरसा मुंडा को मैं केवल स्वतंत्र सेनानी के रूप में नहीं देखता हूँ. बल्कि जैसा कि लेखक ने इस पुस्तक में लिखा है कि साथ ही साथ आध्यात्मिक एवं भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के भी प्रतीक के तौर पर हमें उनको याद करना चाहिए. जैसा कि याद होगा झारखण्ड जहाँ पर बिरसा मुंडा पैदा हुए थे, वहां के वर्तमान मुख्यमंत्री ने कुछ समय पहले बयान दिया था कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, तथा ऐसे ही बयान दूसरे आदिवासी या दलित नेता देते रहते हैं, जिनको इतिहास और वर्त्तमान परिपेक्ष्य की बिल्कुल जानकारी नहीं हैं, उनका एक ही उद्देश्य है – येन केन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति, चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े. इसलिए ऐसे समय में इस पुस्तक की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है. जो आदिवासी और दलित जनता के मन में बढ़ते हुए अलगाववाद को कम करे और उनमें भारतीय सांस्कृतिक चेतना भरे.
    पुस्तक की भाषा सरल एवं सरस है. पूरे पुस्तक में कहीं भी ऐसा नहीं है कि कहानी बहुत जल्दी आगे बढ़ गयी या बहुत धीरे-धीरे बढ़ रही है, कहानी एक निरंतर गति से आगे बढ़ती रहती है. इस विषय एवं इस नायक को चुनने के लिए लेखक को बहुत-बहुत साधुवाद. साथ ही साथ एक शिकायत है लेखक से कि उन्होंने इस पुस्तक के प्रचार के लिए बहुत कम प्रयास किया. और नहीं तो कम से कम सभी भाजपा नेताओं का इस पुस्तक के साथ फोटो हो ऐसा प्रयास लेखक की तरफ से होनी चाहिए, ऐसी मेरी अपेक्षा है. अगर प्रधानमंत्री तक ये पुस्तक पहुंचे तो बहुत अच्छा होगा. तुहिन सिन्हा जी ने इतनी अच्छी पुस्तक लिखी है लेकिन प्रचार का जिम्मा दूसरों पर छोड़ दिया है ये अच्छी बात नहीं है, उनको अपने स्तर पर भी इसकी जिम्मेवारी लेनी चाहिए.

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Description

19वीं शताब्दी में भारत के उस मध्य भाग में आदिवासी अत्यंत बदहाली और अंधकार का जीवन जी रहे थे, जो अब झारखंड राज्य कहलाता है। औपनिवेशिक सत्ता ने स्थानीय षड्यंत्रकारियों की मदद से उनके चारों ओर अत्याचार और शोषण का जाल बुन दिया था, जो किसी जल्लाद के फंदे की तरह कसता जा रहा था। जो कुछ उनके दिल के क़रीब था, यानी उनकी भूमि, घर, इतिहास, परंपराएं, धर्म और परिवार, वो महारानी के लिए भव्य, लेकिन बेरहम साम्राज्य बनाने की व्यापक औपनिवेशिक योजना का शिकार हो गया था। लोगों को हालाँकि जब धूल में मिलाया जाता है और उनकी पहचान पूरी तरह ख़त्म होने का ख़तरा पैदा हो जाता है, तो वे गर्जना के साथ तपिश भरी, क्रोधित आग की तरह इतने भड़क उठते हैं कि यह साम्राज्य के दिल में भीतर तक गूँजने लगता है और सत्ता में बैठे लोगों में भय से सिहरन दौड़ जाती है। यह एक ऐसी आग होती है जो विद्रोह को जन्म देती है। ऐसे ही एक विद्रोह के केंद्र में थे पच्चीस साल के युवा बिरसा मुंडा। उन्होंने अपने समुदाय और उसके लोगों की ज़िंदगियों की रक्षा के लिए आदिवासियों की लड़ाई का नेतृत्व करने का फ़ैसला किया। शेर दिल योद्धा, कल्याणकर्ता, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और एक भुला दिया गया नायक। सच्ची घटनाओं पर आधारित, साहस की यह वीर गाथा बिरसा मुंडा के जीवन को एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने अत्यंत संक्षिप्त जीवन में आदिवासी समुदाय को संगठित किया और ज़बरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। उन्होंने भेदभाव रहित और अधिक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना की और इसके लिए लड़ते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। यह किताब एक आदिवासी नायक की रोमांचकारी कहानी है जिसका इतिहास की ज़्यादातर किताबें उल्लेख नहीं करतीं। स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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19वीं शताब्दी में भारत के उस मध्य भाग में आदिवासी अत्यंत बदहाली और अंधकार का जीवन जी रहे थे, जो अब झारखंड राज्य कहलाता है। औपनिवेशिक सत्ता ने स्थानीय षड्यंत्रकारियों की मदद से उनके चारों ओर अत्याचार और शोषण का जाल बुन दिया था, जो किसी जल्लाद के फंदे की तरह कसता जा रहा था। जो कुछ उनके दिल के क़रीब था, यानी उनकी भूमि, घर, इतिहास, परंपराएं, धर्म और परिवार, वो महारानी के लिए भव्य, लेकिन बेरहम साम्राज्य बनाने की व्यापक औपनिवेशिक योजना का शिकार हो गया था। लोगों को हालाँकि जब धूल में मिलाया जाता है और उनकी पहचान पूरी तरह ख़त्म होने का ख़तरा पैदा हो जाता है, तो वे गर्जना के साथ तपिश भरी, क्रोधित आग की तरह इतने भड़क उठते हैं कि यह साम्राज्य के दिल में भीतर तक गूँजने लगता है और सत्ता में बैठे लोगों में भय से सिहरन दौड़ जाती है। यह एक ऐसी आग होती है जो विद्रोह को जन्म देती है। ऐसे ही एक विद्रोह के केंद्र में थे पच्चीस साल के युवा बिरसा मुंडा। उन्होंने अपने समुदाय और उसके लोगों की ज़िंदगियों की रक्षा के लिए आदिवासियों की लड़ाई का नेतृत्व करने का फ़ैसला किया। शेर दिल योद्धा, कल्याणकर्ता, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और एक भुला दिया गया नायक। सच्ची घटनाओं पर आधारित, साहस की यह वीर गाथा बिरसा मुंडा के जीवन को एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने अत्यंत संक्षिप्त जीवन में आदिवासी समुदाय को संगठित किया और ज़बरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। उन्होंने भेदभाव रहित और अधिक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना की और इसके लिए लड़ते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। यह किताब एक आदिवासी नायक की रोमांचकारी कहानी है जिसका इतिहास की ज़्यादातर किताबें उल्लेख नहीं करतीं। स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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  1. Vineet Kumar Singh

    यह सोचकर आश्चर्य होता है कि बिरसा मुंडा केवल 25 वर्ष जीवित रहे . इतने कम उम्र में उन्होंने संगठन बनाया, अंग्रेजों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, मिशनरीओं द्वारा धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई, धर्मान्तरित लोगों को वापस अपने धर्म से जोड़ा, अपने लोगों के बीच एक चिकित्सक, एक उपदेशक का काम किया. लोग सोचेंगे कि ऐसा तो बहुत लोगों ने किया है. लेकिन यहाँ बात ये है कि जो बिरसा मुंडा कि पृष्ठभूमि है और झारखण्ड कि जो भौगोलिक स्थिति है, वहां यह काम मुश्किल था. इसलिए बिसरा मुंडा विशेष हैं.
    बिरसा मुंडा को मैं केवल स्वतंत्र सेनानी के रूप में नहीं देखता हूँ. बल्कि जैसा कि लेखक ने इस पुस्तक में लिखा है कि साथ ही साथ आध्यात्मिक एवं भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के भी प्रतीक के तौर पर हमें उनको याद करना चाहिए. जैसा कि याद होगा झारखण्ड जहाँ पर बिरसा मुंडा पैदा हुए थे, वहां के वर्तमान मुख्यमंत्री ने कुछ समय पहले बयान दिया था कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, तथा ऐसे ही बयान दूसरे आदिवासी या दलित नेता देते रहते हैं, जिनको इतिहास और वर्त्तमान परिपेक्ष्य की बिल्कुल जानकारी नहीं हैं, उनका एक ही उद्देश्य है – येन केन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति, चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े. इसलिए ऐसे समय में इस पुस्तक की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है. जो आदिवासी और दलित जनता के मन में बढ़ते हुए अलगाववाद को कम करे और उनमें भारतीय सांस्कृतिक चेतना भरे.
    पुस्तक की भाषा सरल एवं सरस है. पूरे पुस्तक में कहीं भी ऐसा नहीं है कि कहानी बहुत जल्दी आगे बढ़ गयी या बहुत धीरे-धीरे बढ़ रही है, कहानी एक निरंतर गति से आगे बढ़ती रहती है. इस विषय एवं इस नायक को चुनने के लिए लेखक को बहुत-बहुत साधुवाद. साथ ही साथ एक शिकायत है लेखक से कि उन्होंने इस पुस्तक के प्रचार के लिए बहुत कम प्रयास किया. और नहीं तो कम से कम सभी भाजपा नेताओं का इस पुस्तक के साथ फोटो हो ऐसा प्रयास लेखक की तरफ से होनी चाहिए, ऐसी मेरी अपेक्षा है. अगर प्रधानमंत्री तक ये पुस्तक पहुंचे तो बहुत अच्छा होगा. तुहिन सिन्हा जी ने इतनी अच्छी पुस्तक लिखी है लेकिन प्रचार का जिम्मा दूसरों पर छोड़ दिया है ये अच्छी बात नहीं है, उनको अपने स्तर पर भी इसकी जिम्मेवारी लेनी चाहिए.

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