ड्रैगन्स गेम I Dragon's Game
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जब से इस धरा पर जीव हैं, इतिहास साक्षी है तभी से ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली सिद्धांत के रूप में लागू है। बस ‘लाठी’ और ‘भैंस’ के स्वरूप बदलते रहे हैं। वर्तमान समय में विश्व में कीमती संसाधनों पर अधिकार करने की लड़ाई जारी है। शीत युद्ध, तेल के लिए खाड़ी देशों की लड़ाई इत्यादि इसके उदाहरण हैं। पराधीनता का स्तर अब भौतिक नहीं, आर्थिक और वैचारिक हो गया है। ‘लाठी’ के रूप में है टेक्नोलॉजी और अर्थशक्ति। क्रियान्वयन का तरीका हो गया है जासूसी और गुप्त ऑपरेशन। मई, 1998 में भारत ने परमाणु विस्फोट कर सारे विश्व को स्तब्ध कर दिया था। इस घटना से सबसे ज्यादा जो बौखलाया, वह था- चीन। इसके पहले तक भूमंडल के 200 के लगभग देशों में केवल 5 सुपर पॉवर थे, अब भारत छठा हो गया था। इतना ही नहीं, एशिया के लगभग 50 देशों में अब तक केवल चीन ही सुपर पॉवर था, अब भारत भी हो गया था। 20वीं सदी के अंत तक, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तमाम यूरोपीय राष्ट्रों को भारी अंतर से पछाड़कर, चीन दूसरे नंबर पर आ गया था। उसके आगे अब एक ही अजेय दुर्ग बचा था, ‘अमेरिका’, जिसके पीछे वह अपनी सारी टेक्नोलॉजी और ख़ुफ़िया शक्ति लगा चुका था। अंतर कम करने के 2 तरीके होते हैं—पहला, स्वयं तेजी से बढ़ना, दूसरा, विरोधी को रोक लेना या पीछे धकेल देना। वह दोनों ही तरीके आजमा रहा था। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनैतिक समीकरण में प्रत्यक्ष से ज्यादा खम-पेंच परोक्ष लड़ाए जाते हैं। उनका क्रियान्वयन आसान तथा किफायती होता है और उनके परिणाम भी बहुत आकर्षक होते हैं। परमाणु विस्फोट के तुरंत बाद ही चीन चेता और उसने अपना वर्चस्व बचाने के लिए छद्म रूप से भारत में ऑपरेशन आरंभ कर दिया। उसे भारत को पीछे धकेलना था। इस काम के लिए उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ने 4 प्रशिक्षित अफ़सर भारत में प्लांट किए, जो अगले 2 दशकों तक किस तरह सांस्कृतिक, वैचारिक, राजनैतिक, धार्मिक, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और रक्षा के कैनवास पर फैलकर, इन्हें अंदर ही अंदर कमजोर करके राष्ट्र को कमजोर करते हैं और अंत में किस तरह पकड़े जाते हैं, यह कहानी है ‘ड्रैगन्स गेम’ की।.
जब से इस धरा पर जीव हैं, इतिहास साक्षी है तभी से ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली सिद्धांत के रूप में लागू है। बस ‘लाठी’ और ‘भैंस’ के स्वरूप बदलते रहे हैं। वर्तमान समय में विश्व में कीमती संसाधनों पर अधिकार करने की लड़ाई जारी है। शीत युद्ध, तेल के लिए खाड़ी देशों की लड़ाई इत्यादि इसके उदाहरण हैं। पराधीनता का स्तर अब भौतिक नहीं, आर्थिक और वैचारिक हो गया है। ‘लाठी’ के रूप में है टेक्नोलॉजी और अर्थशक्ति। क्रियान्वयन का तरीका हो गया है जासूसी और गुप्त ऑपरेशन। मई, 1998 में भारत ने परमाणु विस्फोट कर सारे विश्व को स्तब्ध कर दिया था। इस घटना से सबसे ज्यादा जो बौखलाया, वह था- चीन। इसके पहले तक भूमंडल के 200 के लगभग देशों में केवल 5 सुपर पॉवर थे, अब भारत छठा हो गया था। इतना ही नहीं, एशिया के लगभग 50 देशों में अब तक केवल चीन ही सुपर पॉवर था, अब भारत भी हो गया था। 20वीं सदी के अंत तक, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तमाम यूरोपीय राष्ट्रों को भारी अंतर से पछाड़कर, चीन दूसरे नंबर पर आ गया था। उसके आगे अब एक ही अजेय दुर्ग बचा था, ‘अमेरिका’, जिसके पीछे वह अपनी सारी टेक्नोलॉजी और ख़ुफ़िया शक्ति लगा चुका था। अंतर कम करने के 2 तरीके होते हैं—पहला, स्वयं तेजी से बढ़ना, दूसरा, विरोधी को रोक लेना या पीछे धकेल देना। वह दोनों ही तरीके आजमा रहा था। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनैतिक समीकरण में प्रत्यक्ष से ज्यादा खम-पेंच परोक्ष लड़ाए जाते हैं। उनका क्रियान्वयन आसान तथा किफायती होता है और उनके परिणाम भी बहुत आकर्षक होते हैं। परमाणु विस्फोट के तुरंत बाद ही चीन चेता और उसने अपना वर्चस्व बचाने के लिए छद्म रूप से भारत में ऑपरेशन आरंभ कर दिया। उसे भारत को पीछे धकेलना था। इस काम के लिए उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ने 4 प्रशिक्षित अफ़सर भारत में प्लांट किए, जो अगले 2 दशकों तक किस तरह सांस्कृतिक, वैचारिक, राजनैतिक, धार्मिक, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और रक्षा के कैनवास पर फैलकर, इन्हें अंदर ही अंदर कमजोर करके राष्ट्र को कमजोर करते हैं और अंत में किस तरह पकड़े जाते हैं, यह कहानी है ‘ड्रैगन्स गेम’ की।.
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