Anupameya Shankar
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Kar Vijay Har
 Shikhar
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Dwandwa

Publisher:
Prabhat Prakashan
| Author:
Sudha Murty
| Language:
Hindi
| Format:
Hardback
Publisher:
Prabhat Prakashan
Author:
Sudha Murty
Language:
Hindi
Format:
Hardback

Original price was: ₹300.Current price is: ₹225.

In stock

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7-10 Days

In stock

ISBN:
Page Extent:
168

मुकेश का सगा भाई जिंदा है क्या ? अगर है तो कहाँ है? उसे ढूँढना चाहिए । अपने जीवन की गाथा उसे सुनानी है । इस विशाल संसार में सिर्फ वे ही दोनों एक-दूसरे से रक्‍त से जुड़े हैं ।जीवन की घटनाएँ विचित्र रूप ले रही थीं । तीन दिन पहले वह रूपिंदर-सुरिंदर का पंजाबी मुंडा था । बीस दिन पहले वह त्रिवेदीजी -सुमन का इकलौता बेटा था । लक्ष्मीपुत्र था । भारतीय था । आज वह भारत का भी नहीं है । इस भूमि का; इस देश का; इस संस्कृति का नहीं है । अब वह अमेरिकी है!- द्वंद्व’ से” मुझे आपसे कुछ पूछना है । अच्छा; पहले यह बताइए कि शंकर मेरा कुछ नहीं लगता; फिर हम दोनों हमशक्ल कैसे हैं ?” माँजी; एक सवाल पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगी? शंकर के पिता का देहांत हुआ कैसे? उनके मरण में बहुत राज छिपे हैं । जहाँ तक मेरी समझ है; मेरे पिताजी का कोई रिश्तेदार इस इलाके में नहीं रहा । न पहले थे; न अब हैं । हम लोग शुरू से ही दिल्ली में रहे ।..’ तर्पण ‘ सेसुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के ये दोनों पठनीय सामाजिक उपन्यास पाठकों की संवेदनशीलता और मर्म को भीतर तक छू जाएँगे ।

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Description

मुकेश का सगा भाई जिंदा है क्या ? अगर है तो कहाँ है? उसे ढूँढना चाहिए । अपने जीवन की गाथा उसे सुनानी है । इस विशाल संसार में सिर्फ वे ही दोनों एक-दूसरे से रक्‍त से जुड़े हैं ।जीवन की घटनाएँ विचित्र रूप ले रही थीं । तीन दिन पहले वह रूपिंदर-सुरिंदर का पंजाबी मुंडा था । बीस दिन पहले वह त्रिवेदीजी -सुमन का इकलौता बेटा था । लक्ष्मीपुत्र था । भारतीय था । आज वह भारत का भी नहीं है । इस भूमि का; इस देश का; इस संस्कृति का नहीं है । अब वह अमेरिकी है!- द्वंद्व’ से” मुझे आपसे कुछ पूछना है । अच्छा; पहले यह बताइए कि शंकर मेरा कुछ नहीं लगता; फिर हम दोनों हमशक्ल कैसे हैं ?” माँजी; एक सवाल पूछूँ? बुरा तो नहीं मानेंगी? शंकर के पिता का देहांत हुआ कैसे? उनके मरण में बहुत राज छिपे हैं । जहाँ तक मेरी समझ है; मेरे पिताजी का कोई रिश्तेदार इस इलाके में नहीं रहा । न पहले थे; न अब हैं । हम लोग शुरू से ही दिल्ली में रहे ।..’ तर्पण ‘ सेसुप्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका श्रीमती सुधा मूर्ति के ये दोनों पठनीय सामाजिक उपन्यास पाठकों की संवेदनशीलता और मर्म को भीतर तक छू जाएँगे ।

About Author

सुधा मूर्ति का जन्म 19 अगस्त 1950 को हुआ था। वह एक लेखिका और एक सक्रिय भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह एनजीओ, इन्फोसिस फाउंडेशन का नेतृत्व करती हैं और वह गेट्स फाउंडेशन की पब्लिक हेल्थ केयर इनिशिएटिव्स की जूरी भी हैं। सुधा मूर्ति ने हुबली से इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की। वह कर्नाटक में पहली बार आई थी। इस उपलब्धि को कर्नाटक के सीएम ने स्वर्ण पदक से पुरस्कृत किया। उसने कंपनी के चेयरपर्सन, जेआरडी टाटा को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें टाटा मोटर्स में लैंगिक पक्षपात की शिकायत थी। वह 7 साल तक पुणे में रहीं, जिसके बाद वह मुंबई चली गईं। यह INR 10,000 की उसकी बचत थी जिसने इन्फोसिस की स्थापना में योगदान दिया; एन.आर. नारायण मूर्ति हमेशा इस तथ्य का गर्व के साथ उल्लेख करते हैं, जब भी उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने इन्फोसिस की नींव कैसे रखी। सुधा मूर्ति वास्तव में टाटा मोटर्स, पुणे में चयनित होने वाली पहली महिला इंजीनियर थीं।

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