एक अनाम पत्ती का स्मारक I Ek Anaam Patti Ka Smarak

Publisher:
Hind Yugm
| Author:
Naresh Saxena
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
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Hind Yugm
Author:
Naresh Saxena
Language:
Hindi
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Paperback

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144

नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के एक ऐसे कवि हैं, जिन्हें सभी पीढ़ियाँ गहरा सम्मान देती हैं। उनकी कविताओं के लिए प्रायः लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। कविता रचने के साथ-साथ, वह बाँसुरी और माउथ-ऑर्गन भी तन्मय होकर बजाते हैं।

इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वह अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं पर कंसल्टेंट रहे हैं और साथ ही फ़िल्म, नाटक और संगीत के विविध क्षेत्रों में भी सक्रिय रहे। उन्होंने लघु फ़िल्में, सीरियल और डॉक्यूमेंट्री-फ़िल्मों का निर्माण किया तथा फ़िल्म-निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया।

आईआईटी कानपुर और सागर विश्वविद्यालय की मुक्तिबोध सृजन पीठ पर आयोजित उनकी कार्यशालाएँ इस बात की साक्षी हैं कि वह कविता को केवल लिखते ही नहीं; बल्कि उसे सिखाने, साझा करने और इस दौरान सीखने वालों से भी सीखने की कला जानते हैं।

यह कोई साधारण संयोग नहीं कि वह पानी के इंजीनियर रहे, क्योंकि पानी उनके लिए मात्र विषय नहीं, बल्कि वह प्राणतत्त्व है जो पृथ्वी को चाँद से अलग करता है। उनकी रचनाओं में विज्ञान और कला का दुर्लभ संगम मिलता है, एक ऐसा दृष्टिकोण जिसमें मुक्तिबोध, परसाई, ज्ञानरंजन और विनोद कुमार शुक्ल जैसी सृजनशील परंपराएँ आइंस्टाइन और स्टीफ़न हॉकिंग की जिज्ञासु दृष्टि से सहज रूप में जुड़ जाती हैं। इसीलिए उनकी कविता हमारे समय की सबसे जीवित और सबसे विश्वसनीय गवाही की तरह पढ़ी जाती है।

उनकी कविताएँ केरल, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों में पहले दर्जे से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। इसके साथ ही वह पहल सम्मान, कबीर सम्मान, जनकवि नागार्जुन सम्मान, भवभूति अलंकरण, परसाई सम्मान और कविताकोश जैसे अनेक सम्मानों से सम्मानित हैं।

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नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के एक ऐसे कवि हैं, जिन्हें सभी पीढ़ियाँ गहरा सम्मान देती हैं। उनकी कविताओं के लिए प्रायः लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। कविता रचने के साथ-साथ, वह बाँसुरी और माउथ-ऑर्गन भी तन्मय होकर बजाते हैं।

इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वह अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं पर कंसल्टेंट रहे हैं और साथ ही फ़िल्म, नाटक और संगीत के विविध क्षेत्रों में भी सक्रिय रहे। उन्होंने लघु फ़िल्में, सीरियल और डॉक्यूमेंट्री-फ़िल्मों का निर्माण किया तथा फ़िल्म-निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया।

आईआईटी कानपुर और सागर विश्वविद्यालय की मुक्तिबोध सृजन पीठ पर आयोजित उनकी कार्यशालाएँ इस बात की साक्षी हैं कि वह कविता को केवल लिखते ही नहीं; बल्कि उसे सिखाने, साझा करने और इस दौरान सीखने वालों से भी सीखने की कला जानते हैं।

यह कोई साधारण संयोग नहीं कि वह पानी के इंजीनियर रहे, क्योंकि पानी उनके लिए मात्र विषय नहीं, बल्कि वह प्राणतत्त्व है जो पृथ्वी को चाँद से अलग करता है। उनकी रचनाओं में विज्ञान और कला का दुर्लभ संगम मिलता है, एक ऐसा दृष्टिकोण जिसमें मुक्तिबोध, परसाई, ज्ञानरंजन और विनोद कुमार शुक्ल जैसी सृजनशील परंपराएँ आइंस्टाइन और स्टीफ़न हॉकिंग की जिज्ञासु दृष्टि से सहज रूप में जुड़ जाती हैं। इसीलिए उनकी कविता हमारे समय की सबसे जीवित और सबसे विश्वसनीय गवाही की तरह पढ़ी जाती है।

उनकी कविताएँ केरल, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों में पहले दर्जे से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। इसके साथ ही वह पहल सम्मान, कबीर सम्मान, जनकवि नागार्जुन सम्मान, भवभूति अलंकरण, परसाई सम्मान और कविताकोश जैसे अनेक सम्मानों से सम्मानित हैं।

About Author

नरेश सक्सेना का जन्म 16 जनवरी 1939 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ। मुरैना से शिक्षा की शुरुआत हुई। जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने बीई (ऑनर्स) किया और कोलकाता के ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हाइजीन ऐंड पब्लिक हेल्थ से एमई-पीएच का प्रशिक्षण लिया। उत्तर प्रदेश जल निगम में उप-प्रबंधक, टेक्नोलॉजी मिशन के कार्यकारी निदेशक। ऑस्ट्रेलिया, हॉलैंड, लीबिया द्वारा फ़ंडेड अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्टस पर क्रमशः शिलांग, मिर्ज़ापुर, त्रिपोली में तथा ए.डी.बी. (एशियन डेवलपमेंट बैंक, मनीला) के लिए देहरादून में इंजीनियरिंग कन्सल्टेन्ट रहे। टेलीविज़न और रंगमंच के लिए उन्होंने ‘प्रेत’, ‘हर क्षण विदा है’, ‘दसवीं दौड़’, ‘एक हती मनू’ (बुंदेली) नाटक लिखे। एक नाटक ‘आदमी का आ’ देश की कई भाषाओं में पाँच हज़ार से ज़्यादा बार प्रदर्शित हुआ। ‘संबंध’, ‘जल से ज्योति’, ‘समाधान’ और ‘नन्हे क़दम’ आदि लघु फ़िल्मों का लेखन और निर्देशन किया। विजय नरेश द्वारा निर्देशित वृत्त फ़िल्मों ‘जौनसार बावर’ और ‘रसखान’ का आलेखन भी किया। अब तक उनके चार कविता-संग्रह प्रकाशित हैं—‘समुद्र पर हो रही है बारिश’, ‘सुनो चारुशीला’, ‘नरेश सक्सेना और उनकी चुनिंदा कविताएँ’ (चयन) और ‘क्या कोई पंक्ति डूबेगी ख़ून में’ (चयन)। विभिन्न राज्यों में पहली कक्षा से लेकर एम.ए. तक के पाठ्यक्रमों में कविताएँ सम्मिलित। लखनऊ आकाशवाणी से राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए निराला, धूमिल, कुँवर नारायण, लीलाधर जगूड़ी आदि की कविताओं की संगीत संरचनाओं और दिल्ली, भोपाल और लखनऊ दूरदर्शन के लिए सीरियलों का निर्माण किया। सागर विश्वविद्यालय में दो वर्ष ‘मुक्तिबोध सृजन पीठ’ के अध्यक्ष रहे। साहित्यिक पत्रिका ‘आरम्भ’, ‘वर्ष’ और उ. प्र. संगीत नाटक अकादमी के त्रैमासिक ‘छायानट’ का विनोद भारद्वाज, रवींद्र कालिया और ममता कालिया के साथ संपादन। ‘रचना समय’ के कविता विशेषांक का अतिथि संपादन। उन्हें ‘पहल सम्मान’, निर्देशन के लिए ‘राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार’, हिंदी साहित्य सम्मेलन का सम्मान, ‘ऋतुराज सम्मान’, ‘मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान’, ‘नागार्जुन सम्मान’, ‘शमशेर सम्मान’, ‘राही मासूम रज़ा सम्मान’, ‘नामवर सिंह सम्मान’, ‘कबीर सम्मान’ सहित अन्य कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

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