फ़िज़ूल रातें I Fizool Raatein

Publisher:
Hind Yugm
| Author:
Dheerendra Singh
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
Publisher:
Hind Yugm
Author:
Dheerendra Singh
Language:
Hindi
Format:
Paperback

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384

फ़िज़ूल रातें’ एक ऐसी कथा है, जो 1947 से उन्नीस वर्ष पहले की उस सरगर्मी को पकड़ती है, जब भारत ‘साइमन गो बैक’ के नारों से गूंज रहा था। इसी दौर में एक शाही औलाद—शहज़ादा हयुलानी—का जन्म होता है, जो बचपन से ही एक अजीब, भयावह ख़्वाब से ग्रसित है। यह उपन्यास उसी ख़्वाब, उसी बेचैनी, और उसी मानसिक भूचाल की शिनाख़्त है, जो एक इंसान को बेक़रारी और जुनून की हदों तक ले जाता है।

हयुलानी की आँखों से देखी गई यह कहानी केवल एक व्यक्ति की मानसिक गाथा नहीं है, बल्कि एक पूरे मुल्क की आज़ादी, बँटवारे, और सामूहिक उन्माद की पृष्ठभूमि को दर्शाती है। धीरेन्द्र सिंह का यह उपन्यास भाषा, इतिहास और कल्पना की सीमाओं को लांघता हुआ आपको उस तहस-नहस की ओर ले जाता है, जहाँ सब कुछ ढह जाने के बाद ही शायद कोई शांति संभव है।

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Description

फ़िज़ूल रातें’ एक ऐसी कथा है, जो 1947 से उन्नीस वर्ष पहले की उस सरगर्मी को पकड़ती है, जब भारत ‘साइमन गो बैक’ के नारों से गूंज रहा था। इसी दौर में एक शाही औलाद—शहज़ादा हयुलानी—का जन्म होता है, जो बचपन से ही एक अजीब, भयावह ख़्वाब से ग्रसित है। यह उपन्यास उसी ख़्वाब, उसी बेचैनी, और उसी मानसिक भूचाल की शिनाख़्त है, जो एक इंसान को बेक़रारी और जुनून की हदों तक ले जाता है।

हयुलानी की आँखों से देखी गई यह कहानी केवल एक व्यक्ति की मानसिक गाथा नहीं है, बल्कि एक पूरे मुल्क की आज़ादी, बँटवारे, और सामूहिक उन्माद की पृष्ठभूमि को दर्शाती है। धीरेन्द्र सिंह का यह उपन्यास भाषा, इतिहास और कल्पना की सीमाओं को लांघता हुआ आपको उस तहस-नहस की ओर ले जाता है, जहाँ सब कुछ ढह जाने के बाद ही शायद कोई शांति संभव है।

About Author

धीरेन्द्र सिंह फ़ैयाज़ ज़बान और अदब के उदाहरण से एक संजीदा पाठक, शाइर और लेखक हैं। उनका अध्ययन विस्तृत है। वो मौजूदा अदबी और शाइराना मसाइल पर गहरी नज़र रखते हैं। धीरेन्द्र जितने संजीदा पाठक हैं, उतने ही संजीदा शाइर और लेखक भी हैं। पढ़ने-पढ़ाने की अपनी बेहतरीन सलाहियत के कारण वो साहित्य के समकालीन परिदृश्य में अपने पाठकों और शागिर्दों के दरमियान बेहद सम्मानित और प्रिय हैं। उनकी पैदाइश 10 जुलाई 1987 में खजुराहो के नज़्दीक चँदला नाम के एक क़स्बे में हुई। इन दिनों धीरेन्द्र मुस्तक़िल तौर पर इंदौर में रहते हैं। वो मुंबई के 26/11 के हमलों पर आधारित अँग्रेज़ी उपन्यास ‘वुंडेड मुंबई’ लिख चुके हैं। उनकी ग़ज़लों का संग्रह ‘ख़ामुशी रास्ता निकालेगी’ 2021 में, ग़ज़ल के छंद-शास्त्र पर उनकी किताब 'इल्म में भी सुरूर है लेकिन' 2022 में और उर्दू भाषा के संबंध में काफ़ी चर्चित रही। उनकी किताब 'मैं उर्दू हूँ' 2023 में प्रकाशित हो चुकी है।

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