फ़िज़ूल रातें I Fizool Raatein
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फ़िज़ूल रातें’ एक ऐसी कथा है, जो 1947 से उन्नीस वर्ष पहले की उस सरगर्मी को पकड़ती है, जब भारत ‘साइमन गो बैक’ के नारों से गूंज रहा था। इसी दौर में एक शाही औलाद—शहज़ादा हयुलानी—का जन्म होता है, जो बचपन से ही एक अजीब, भयावह ख़्वाब से ग्रसित है। यह उपन्यास उसी ख़्वाब, उसी बेचैनी, और उसी मानसिक भूचाल की शिनाख़्त है, जो एक इंसान को बेक़रारी और जुनून की हदों तक ले जाता है।
हयुलानी की आँखों से देखी गई यह कहानी केवल एक व्यक्ति की मानसिक गाथा नहीं है, बल्कि एक पूरे मुल्क की आज़ादी, बँटवारे, और सामूहिक उन्माद की पृष्ठभूमि को दर्शाती है। धीरेन्द्र सिंह का यह उपन्यास भाषा, इतिहास और कल्पना की सीमाओं को लांघता हुआ आपको उस तहस-नहस की ओर ले जाता है, जहाँ सब कुछ ढह जाने के बाद ही शायद कोई शांति संभव है।
फ़िज़ूल रातें’ एक ऐसी कथा है, जो 1947 से उन्नीस वर्ष पहले की उस सरगर्मी को पकड़ती है, जब भारत ‘साइमन गो बैक’ के नारों से गूंज रहा था। इसी दौर में एक शाही औलाद—शहज़ादा हयुलानी—का जन्म होता है, जो बचपन से ही एक अजीब, भयावह ख़्वाब से ग्रसित है। यह उपन्यास उसी ख़्वाब, उसी बेचैनी, और उसी मानसिक भूचाल की शिनाख़्त है, जो एक इंसान को बेक़रारी और जुनून की हदों तक ले जाता है।
हयुलानी की आँखों से देखी गई यह कहानी केवल एक व्यक्ति की मानसिक गाथा नहीं है, बल्कि एक पूरे मुल्क की आज़ादी, बँटवारे, और सामूहिक उन्माद की पृष्ठभूमि को दर्शाती है। धीरेन्द्र सिंह का यह उपन्यास भाषा, इतिहास और कल्पना की सीमाओं को लांघता हुआ आपको उस तहस-नहस की ओर ले जाता है, जहाँ सब कुछ ढह जाने के बाद ही शायद कोई शांति संभव है।
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