Hriday Sutra
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I AM KRISHNA - VOL 2
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Humaawaaz Dilliyan

Publisher:
Hind Yugm
| Author:
Meera Kant
| Language:
English
| Format:
Paperback
Publisher:
Hind Yugm
Author:
Meera Kant
Language:
English
Format:
Paperback

Original price was: ₹150.Current price is: ₹149.

In stock

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7-10 Days

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ISBN:
Category:
Page Extent:
248

Reading books is a kind of enjoyment. Reading books is a good habit. We bring you a different kinds of books. You can carry this book where ever you want. It is easy to carry. It can be an ideal gift to yourself and to your loved ones. Care instruction keep away from fire.

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Description

Reading books is a kind of enjoyment. Reading books is a good habit. We bring you a different kinds of books. You can carry this book where ever you want. It is easy to carry. It can be an ideal gift to yourself and to your loved ones. Care instruction keep away from fire.

About Author

श्रीनगर में जन्मीं डॉ. मीरा कांत ने कहानी, उपन्यास, नाटक, सफ़रनामा यानी आज की लगभग हर विधा में पूरी कामयाबी के साथ क़लम आज़माइश की है। कविताएँ उन्होंने इक्का-दुक्का ही लिखी हैं लेकिन उनके लेखन में उनके भीतर छिपा कवि-मन हमेशा झाँकता हुआ नज़र आता है। मीरा कांत के यहाँ मिथक है तो इतिहास भी है। इन सबसे बढ़कर मौजूदा समय है। समय और माहौल जो भी हो मुद्दे जीवन से जुड़े होते हैं। उनके नाम ' काग़ज़ी बुर्ज', 'गली दुल्हनवाली' जैसे मानवीय संवेदना से लबरेज़ कहानी-संग्रह हैं तो ' उर्फ़ हिटलर' और ' एक कोई था कहीं नहीं-सा' जैसे सशक्त उपन्यास भी हैं। ' नेपथ्य राग', 'अंत हाज़िर हो' , 'भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर' आदि उनके नाटक देश के अलग-अलग शहरों में मंचित हो रहे हैं। मीरा कांत की पहचान उस लेखन से की जाती है जिसने तंग नज़री पैदा करने वाले हर वाद और नारे को दरकिनार किया है। उनकी लेखनी हाशिए पर सहमी, सुनी-अनसुनी मानवता की पुकार की हिमायती रही है। उनकी अदबी दुनिया में तरह-तरह के किरदारों की आहटें, बिलबिलाहटें और सिसकियाँ सुनी जा सकती हैं। परत-दर-परत छिपे दर्द को महसूस किया जा सकता है तो उससे भी बढ़कर किरदारों के संघर्षों को। मीरा कांत की ज़बान की रेंज उनके मौज़ू से जुगलबंदी करती है। ज़बान के कई मिज़ाज और रंग देखने को मिलते हैं। यहाँ हिंदी-उर्दू की मिली-जुली ख़ुशबू है तो गाहे-बगाहे कश्मीरियत की कल-कल भी सुनाई देती है। अपने लेखन के लिए मीरा कांत को दो बार मोहन राकेश सम्मान (प्रथम पुरस्कार), नटसम्राट सम्मान और हिंदी अकादमी, दिल्ली के साहित्यकार सम्मान सहित कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। उनकी कृतियों के देश की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

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