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Kyap

Publisher:
Vani Prakashan
| Author:
मनोहर श्याम जोशी
| Language:
Hindi
| Format:
Hardback
Publisher:
Vani Prakashan
Author:
मनोहर श्याम जोशी
Language:
Hindi
Format:
Hardback

Original price was: ₹395.Current price is: ₹296.

In stock

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7-10 Days

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ISBN:
Category:
Page Extent:
152

‘क्याप’-मायने कुछ अजीब, अनगढ़, अनदेखा-सा और अप्रत्याशित। जोशी जी के विलक्षण गद्य में कही गयी यह ‘फसक’ (गप) उस अनदेखे को अप्रत्याशित ढंग से दिखाती है, जिसे देखते रहने के आदी बन गये हम जिसका मतलब पूछना और बूझना भूल चले हैं… अपने समाज की आधी-अधूरी आधुनिकता और बौद्धिकों की अधकचरी उत्तर-आधुनिकता से जानलेवा ढंग से टकराती प्रेम कथा की यह ‘क्याप’ बदलाव में सपनों की दारुण परिणति को कुछ ऐसे ढंग से पाठक तक पहुँचाती है कि पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते रहने वाला पाठक एकाएक ख़ुद से पूछ बैठे कि ‘अरे! ये पलकें क्यों भीग गयीं।’ यथार्थ चित्रण के नाम पर सपाटे से सपाटबयानी और फार्मूलेबाज़ी करने वाले उपन्यासों कहानियों से भरे इस वक़्त में, कुछ लोगों को शायद लगे कि ‘मैं’ और उत्तरा के प्रेम की यह कहानी, और कुछ नहीं बस, ‘ख़लल है दिमाग का’, लेकिन प्रवचन या रिपोर्ट की बजाय सर्जनात्मक स्वर सुनने को उत्सुक पाठक इस अद्भुत ‘फसक’ में अपने समय की डरावनी सचाइयों को ऐन अपने प्रेमानुभव में एकतान होते सुन सकता है। बेहद आत्मीय और प्रामणिक ढंग से। गहरे आत्ममन्थन, सघन समग्रता बोध और अपूर्व बतरस से भरपूर ‘क्याप’ पर हिन्दी समाज निश्चय ही गर्व कर सकता है। -पुरुषोत्तम अग्रवाल

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Description

‘क्याप’-मायने कुछ अजीब, अनगढ़, अनदेखा-सा और अप्रत्याशित। जोशी जी के विलक्षण गद्य में कही गयी यह ‘फसक’ (गप) उस अनदेखे को अप्रत्याशित ढंग से दिखाती है, जिसे देखते रहने के आदी बन गये हम जिसका मतलब पूछना और बूझना भूल चले हैं… अपने समाज की आधी-अधूरी आधुनिकता और बौद्धिकों की अधकचरी उत्तर-आधुनिकता से जानलेवा ढंग से टकराती प्रेम कथा की यह ‘क्याप’ बदलाव में सपनों की दारुण परिणति को कुछ ऐसे ढंग से पाठक तक पहुँचाती है कि पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते रहने वाला पाठक एकाएक ख़ुद से पूछ बैठे कि ‘अरे! ये पलकें क्यों भीग गयीं।’ यथार्थ चित्रण के नाम पर सपाटे से सपाटबयानी और फार्मूलेबाज़ी करने वाले उपन्यासों कहानियों से भरे इस वक़्त में, कुछ लोगों को शायद लगे कि ‘मैं’ और उत्तरा के प्रेम की यह कहानी, और कुछ नहीं बस, ‘ख़लल है दिमाग का’, लेकिन प्रवचन या रिपोर्ट की बजाय सर्जनात्मक स्वर सुनने को उत्सुक पाठक इस अद्भुत ‘फसक’ में अपने समय की डरावनी सचाइयों को ऐन अपने प्रेमानुभव में एकतान होते सुन सकता है। बेहद आत्मीय और प्रामणिक ढंग से। गहरे आत्ममन्थन, सघन समग्रता बोध और अपूर्व बतरस से भरपूर ‘क्याप’ पर हिन्दी समाज निश्चय ही गर्व कर सकता है। -पुरुषोत्तम अग्रवाल

About Author

मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

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