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Nishachar

Publisher:
RajKamal
| Author:
Bhishm Sahni
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
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Author:
Bhishm Sahni
Language:
Hindi
Format:
Paperback

Original price was: ₹150.Current price is: ₹149.

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7-10 Days

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ISBN:
Page Extent:
159

भीष्म साहनी ने बतौर कथाकार जो रास्ता चुना, उसके आधार पर अगर उन्हें पथ-प्रवर्तक कहा जाए तो वह गलत इसलिए होगा कि उसका अनुकरण हर किसी के लिए लिहाज नहीं है । बह रास्ता स्वयं सहजता का है, और उस पर चलने क्री हर सचेत कोशिश अपको न सिर्फ असहज, बल्कि अमौलिक भी कर देगी । वह सहजता जीवन के स्व-भाव से आती है जिसे आप अपने परिवेश के बीचोबीच रहते हुए अजित भी नहीं करते, सिर्फ स्वीकार करते हैं । यथार्थ के प्रति यह स्वीकृति- अभाव ही द्रष्टा को यथार्थ के सम्पूर्ण तक ले जाता है । यह यह आश्चर्यजनक है कि प्रगतिशील विचारधारा में प्रशिक्षित भीष्म जी ने अपने कथाकार को कभी इस स्वीकृति-भाव से वंचित नहीं किया । अपनी हर कथा-रचना की तरह इस संग्रह की कहानियों में भी भीष्म जी ने दृष्टि की उस विराटता का परिचय दिया है । वर्ष 1983 में प्रकाशित इस संग्रह में उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘चाचा मंगलसेन’ भी है । साथ ही ‘जहूर बख्श’, ‘सरदारनी’ और ‘सलमा आपा’ सहित कुल चौदह कहानियों से सम्पन्न यह पुस्तक स्रम्बन्धों के बनते-बिगड़ते रूपों और उनके मध्य अकुंठ खडी मानवीय जिजीविषा के अनेक आत्मीय और करुण चित्र हमें देती है । ये कहानियाँ गहरे संघर्ष के बाबजूद पलायन नहीं करने की जिद को भी रेखांकित करती हैं और वीभत्स के सम्मुख खड़े सौन्दर्य को भी।

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भीष्म साहनी ने बतौर कथाकार जो रास्ता चुना, उसके आधार पर अगर उन्हें पथ-प्रवर्तक कहा जाए तो वह गलत इसलिए होगा कि उसका अनुकरण हर किसी के लिए लिहाज नहीं है । बह रास्ता स्वयं सहजता का है, और उस पर चलने क्री हर सचेत कोशिश अपको न सिर्फ असहज, बल्कि अमौलिक भी कर देगी । वह सहजता जीवन के स्व-भाव से आती है जिसे आप अपने परिवेश के बीचोबीच रहते हुए अजित भी नहीं करते, सिर्फ स्वीकार करते हैं । यथार्थ के प्रति यह स्वीकृति- अभाव ही द्रष्टा को यथार्थ के सम्पूर्ण तक ले जाता है । यह यह आश्चर्यजनक है कि प्रगतिशील विचारधारा में प्रशिक्षित भीष्म जी ने अपने कथाकार को कभी इस स्वीकृति-भाव से वंचित नहीं किया । अपनी हर कथा-रचना की तरह इस संग्रह की कहानियों में भी भीष्म जी ने दृष्टि की उस विराटता का परिचय दिया है । वर्ष 1983 में प्रकाशित इस संग्रह में उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘चाचा मंगलसेन’ भी है । साथ ही ‘जहूर बख्श’, ‘सरदारनी’ और ‘सलमा आपा’ सहित कुल चौदह कहानियों से सम्पन्न यह पुस्तक स्रम्बन्धों के बनते-बिगड़ते रूपों और उनके मध्य अकुंठ खडी मानवीय जिजीविषा के अनेक आत्मीय और करुण चित्र हमें देती है । ये कहानियाँ गहरे संघर्ष के बाबजूद पलायन नहीं करने की जिद को भी रेखांकित करती हैं और वीभत्स के सम्मुख खड़े सौन्दर्य को भी।

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