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पोटली के दाने – आलोक कुमार मिश्रा

Publisher:
Setu Prakashan Samuh
| Author:
Alok Kumar Mishra
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
Publisher:
Setu Prakashan Samuh
Author:
Alok Kumar Mishra
Language:
Hindi
Format:
Paperback

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SKU 9789362011367 Category
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Page Extent:
164

सुपरिचित युवा कवि आलोक कुमार मिश्रा के इस पहले कविता संग्रह का जीवद्रव्य है प्रेम। इस संग्रह को पढ़ते हुए मन सहजता के अलक्षित कोनों की यात्रा पर निकल जाता है। प्रेम की विविध अर्थ छवियाँ इस संकलन के घनत्व को बढ़ा देती हैं। यहाँ ‘स्व’ नहीं ‘अन्य’ महत्त्वपूर्ण है। ग्रामीण और कस्बाई अनुराग का उज्ज्वल पक्ष इस संग्रह की कई कविताओं में है; लेकिन इसका यह आशय नहीं कि इस संग्रह में जीवन-जगत के दूसरे जरूरी सत्य अनुपस्थित हैं। आलोक की राजनीतिक चेतना संग्रह की पहली ही कविता में दीख जाती है। उनकी ‘सुकामना’ शीर्षक कविता उनका घोषणा-पत्र है। ‘बहिर्गमन’ और उस जैसी कुछ अन्य कविताएँ यह संकेतित करती हैं कि इस युवा कवि के पास लम्बी यात्रा का रसद मौजूद है। देह और वैभव के रहस्य-लोक को चीन्हने-पाने की उदग्रता वाले इस आक्रामक समय का प्रत्याख्यान करती हैं आलोक की ये मनुष्यधर्मी कविताएँ। समकालीन समय के अँधेरे में मन और सम्बन्धों के उजास की तड़प इनमें विन्यस्त है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह विशेषता इन कविताओं में चमक भर देती है। कविताओं की भीड़ में इन कविताओं को अलग से पहचाना जा सकता है। आलोक का जाग्रत विवेक जानता है- ‘अब क्षमा एक अस्त्र है। जिससे काटी जाती है विद्रोह की धार।’ कहना होगा कि ऐसी पंक्तियाँ वही लिख सकता है जो अपने समय के समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को ठीक से जानता-पहचानता हो। इस संग्रह की नसीहतें, सन्देश, रेस, तुम्हारा साथ, बेरोजगार पिता के बच्चे, बेरोजगार सन्तानों के बूढ़े पिता, इच्छा, मेरी बेटियो, आग वाली औरतें, ओलम्पिक पोडियम पर मेरे देश की एक लड़की, प्रार्थना, सुनो प्रिय, जब प्रेम में हों बेटियाँ, एक मरे हुए का डर, कल जब उठें बच्चे जैसी कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता का आयतन बढ़ाती हैं। इन कविताओं में आलोक के कवि-कर्म की गहराई देखते ही बनती है।
आलोक कुमार मिश्रा जल्दबाज कवि नहीं हैं। उनके यहाँ कविता को लेकर कोई हड़बड़ी नहीं है। एक रचनात्मक धैर्य इस कवि की बनावट में शामिल है। इसी के साथ एक और महत्त्वपूर्ण बात आलोक के सन्दर्भ में रेखांकित की जानी चाहिए। वह है, कवित्व का निर्वाह। एक ऐसे समय में जब कविता में गद्यमयता का बोलबाला है तब लयात्मकता और सम्प्रेषण के पक्ष में खड़ा होना दरअसल कविता के पक्ष में खड़ा होना है। आलोक की कविताओं में पाठक को कविता पढ़ने का सुख मिलता है। इन कविताओं में विचार और कला का सुन्दर रसायन है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कविता प्रेमियों के बीच यह संग्रह लोकप्रियता हासिल करेगा।
– जितेन्द्र श्रीवास्तव

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Description

सुपरिचित युवा कवि आलोक कुमार मिश्रा के इस पहले कविता संग्रह का जीवद्रव्य है प्रेम। इस संग्रह को पढ़ते हुए मन सहजता के अलक्षित कोनों की यात्रा पर निकल जाता है। प्रेम की विविध अर्थ छवियाँ इस संकलन के घनत्व को बढ़ा देती हैं। यहाँ ‘स्व’ नहीं ‘अन्य’ महत्त्वपूर्ण है। ग्रामीण और कस्बाई अनुराग का उज्ज्वल पक्ष इस संग्रह की कई कविताओं में है; लेकिन इसका यह आशय नहीं कि इस संग्रह में जीवन-जगत के दूसरे जरूरी सत्य अनुपस्थित हैं। आलोक की राजनीतिक चेतना संग्रह की पहली ही कविता में दीख जाती है। उनकी ‘सुकामना’ शीर्षक कविता उनका घोषणा-पत्र है। ‘बहिर्गमन’ और उस जैसी कुछ अन्य कविताएँ यह संकेतित करती हैं कि इस युवा कवि के पास लम्बी यात्रा का रसद मौजूद है। देह और वैभव के रहस्य-लोक को चीन्हने-पाने की उदग्रता वाले इस आक्रामक समय का प्रत्याख्यान करती हैं आलोक की ये मनुष्यधर्मी कविताएँ। समकालीन समय के अँधेरे में मन और सम्बन्धों के उजास की तड़प इनमें विन्यस्त है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह विशेषता इन कविताओं में चमक भर देती है। कविताओं की भीड़ में इन कविताओं को अलग से पहचाना जा सकता है। आलोक का जाग्रत विवेक जानता है- ‘अब क्षमा एक अस्त्र है। जिससे काटी जाती है विद्रोह की धार।’ कहना होगा कि ऐसी पंक्तियाँ वही लिख सकता है जो अपने समय के समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को ठीक से जानता-पहचानता हो। इस संग्रह की नसीहतें, सन्देश, रेस, तुम्हारा साथ, बेरोजगार पिता के बच्चे, बेरोजगार सन्तानों के बूढ़े पिता, इच्छा, मेरी बेटियो, आग वाली औरतें, ओलम्पिक पोडियम पर मेरे देश की एक लड़की, प्रार्थना, सुनो प्रिय, जब प्रेम में हों बेटियाँ, एक मरे हुए का डर, कल जब उठें बच्चे जैसी कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता का आयतन बढ़ाती हैं। इन कविताओं में आलोक के कवि-कर्म की गहराई देखते ही बनती है।
आलोक कुमार मिश्रा जल्दबाज कवि नहीं हैं। उनके यहाँ कविता को लेकर कोई हड़बड़ी नहीं है। एक रचनात्मक धैर्य इस कवि की बनावट में शामिल है। इसी के साथ एक और महत्त्वपूर्ण बात आलोक के सन्दर्भ में रेखांकित की जानी चाहिए। वह है, कवित्व का निर्वाह। एक ऐसे समय में जब कविता में गद्यमयता का बोलबाला है तब लयात्मकता और सम्प्रेषण के पक्ष में खड़ा होना दरअसल कविता के पक्ष में खड़ा होना है। आलोक की कविताओं में पाठक को कविता पढ़ने का सुख मिलता है। इन कविताओं में विचार और कला का सुन्दर रसायन है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कविता प्रेमियों के बीच यह संग्रह लोकप्रियता हासिल करेगा।
– जितेन्द्र श्रीवास्तव

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