Jayshankar Prasad Set Of 4 Books : sampurn kahaniyan I sampurn naatak I sampurn upanyas I Sampurn Kavya

Publisher:
Atulya Publication
| Author:
Jayshankar Prasad
| Language:
Hindi
| Format:
Omnibus/Box Set (Hardback)
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Atulya Publication
Author:
Jayshankar Prasad
Language:
Hindi
Format:
Omnibus/Box Set (Hardback)

Original price was: ₹3,440.Current price is: ₹2,752.

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7-10 Days

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Page Extent:
1800

जयशंकर प्रसाद की “संपूर्ण रचनाएँ” नामक यह चार पुस्तकों का सेट हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए एक अनमोल संग्रह है। इस सेट में उनकी संपूर्ण कहानियाँ, नाटक, उपन्यास और काव्य एक साथ संकलित हैं, जिससे पाठक उनके बहुआयामी लेखन से रूबरू हो सकते हैं। जयशंकर प्रसाद छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं और उनके साहित्य में गहरी भावनात्मकता, ऐतिहासिक दृष्टिकोण और काव्यात्मक भाषा का अद्वितीय मेल देखने को मिलता है।

पहली पुस्तक में उनकी संपूर्ण कहानियाँ संकलित हैं, जिनमें ‘ग्राम’, ‘आंधी’, ‘छोटा जादूगर’ जैसी कालजयी कहानियाँ शामिल हैं। दूसरी पुस्तक में उनके संपूर्ण नाटक संकलित हैं, जिनमें ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नाटक हैं, जो राष्ट्रभक्ति और संस्कृति के गौरव को उद्घाटित करते हैं। तीसरी पुस्तक में उनके संपूर्ण उपन्यास जैसे ‘कंकाल’, ‘तितली’ और ‘इरावती’ शामिल हैं, जिनमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक विषयों की प्रस्तुति है।

चौथी और अंतिम पुस्तक में उनका संपूर्ण काव्य संग्रहीत है, जिसमें ‘कामायनी’, ‘आंसू’, ‘झरना’ जैसी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ सम्मिलित हैं। प्रसाद की कविताएँ दर्शन, अध्यात्म और मानव मन की गहराइयों में उतरने का अवसर देती हैं। यह चार पुस्तकों का संग्रह न केवल एक साहित्यिक खजाना है, बल्कि यह हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति की आत्मा को भी प्रतिबिंबित करता है। जो पाठक हिंदी साहित्य की गहराई में जाना चाहते हैं, उनके लिए यह सेट अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय है।

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Description

जयशंकर प्रसाद की “संपूर्ण रचनाएँ” नामक यह चार पुस्तकों का सेट हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए एक अनमोल संग्रह है। इस सेट में उनकी संपूर्ण कहानियाँ, नाटक, उपन्यास और काव्य एक साथ संकलित हैं, जिससे पाठक उनके बहुआयामी लेखन से रूबरू हो सकते हैं। जयशंकर प्रसाद छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं और उनके साहित्य में गहरी भावनात्मकता, ऐतिहासिक दृष्टिकोण और काव्यात्मक भाषा का अद्वितीय मेल देखने को मिलता है।

पहली पुस्तक में उनकी संपूर्ण कहानियाँ संकलित हैं, जिनमें ‘ग्राम’, ‘आंधी’, ‘छोटा जादूगर’ जैसी कालजयी कहानियाँ शामिल हैं। दूसरी पुस्तक में उनके संपूर्ण नाटक संकलित हैं, जिनमें ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नाटक हैं, जो राष्ट्रभक्ति और संस्कृति के गौरव को उद्घाटित करते हैं। तीसरी पुस्तक में उनके संपूर्ण उपन्यास जैसे ‘कंकाल’, ‘तितली’ और ‘इरावती’ शामिल हैं, जिनमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक विषयों की प्रस्तुति है।

चौथी और अंतिम पुस्तक में उनका संपूर्ण काव्य संग्रहीत है, जिसमें ‘कामायनी’, ‘आंसू’, ‘झरना’ जैसी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ सम्मिलित हैं। प्रसाद की कविताएँ दर्शन, अध्यात्म और मानव मन की गहराइयों में उतरने का अवसर देती हैं। यह चार पुस्तकों का संग्रह न केवल एक साहित्यिक खजाना है, बल्कि यह हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति की आत्मा को भी प्रतिबिंबित करता है। जो पाठक हिंदी साहित्य की गहराई में जाना चाहते हैं, उनके लिए यह सेट अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय है।

About Author

जयशंकर प्रसाद हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक थे — अन्य तीन थे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। उनका जन्म 30 जनवरी 1889 को वाराणसी के एक समृद्ध सुगंधी व्यापारी परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे गंभीर, अध्यात्मप्रिय और साहित्य के प्रति रुचिशील थे। प्रारंभ में उन्होंने ब्रज और अवधी में कविता लिखना शुरू किया, परंतु बाद में खड़ी बोली को अपनाया और उसे काव्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी भावपूर्ण, संगीतमय और प्रभावशाली थी। जयशंकर प्रसाद बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका महाकाव्य 'कामायनी' छायावाद की उत्कृष्टतम रचना मानी जाती है, जिसमें मनोविज्ञान, दर्शन और भावुकता का गहन समन्वय है। ‘कंकाल’, ‘तितली’, और ‘इरावती’ जैसे उपन्यासों में उन्होंने समाज के बदलते मूल्यों, नारी मन और मनुष्य के द्वंद्व को बड़ी संवेदनशीलता से चित्रित किया है। उनके ऐतिहासिक नाटक ‘चंद्रगुप्त’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ भारतीय इतिहास की गौरवशाली झलक दिखाते हैं। कहानियों में ‘ग्राम’, ‘पुरस्कार’, ‘छोटा जादूगर’ जैसी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। 15 नवंबर 1937 को उनका निधन हुआ, परंतु उनका साहित्य आज भी हिंदी पाठकों और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। वे न केवल एक कवि थे, बल्कि एक विचारक, इतिहास दृष्टा और संस्कृति के सजग प्रहरी भी थे।

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